About Me

Sunday, December 19, 2010

appeasement politics

कॉंग्रेस जिसे युवराज घोषित कर चुकी है वही राहुल गाँधी आज अपने ऊटपटांग बयानों में फंसे हुए है! राहुल पहले आर एस एस जैसे सामाजिक संघटन की बेतुकी तुलना कर के अपने दिवालियापन का परिचय दे चुके है, और अब उनका जो बयान सामने आया है वो उनके मानसिक संतुलन पर सवाल खड़ा करता है! आतंकवाद देश की गंभीर समस्या है और ऐसे हालात में राहुल गाँधी का मुस्लिम तुष्टिकरण से ओतप्रोत बयान निंदनीय है ! भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी कॉंग्रेस मुद्दे से ध्यान हटाने के लिए अब घटिया बयानबाजी के साथ साथ देश के आंतरिक मुद्दे को दूसरे देश के सामने तथ्य को तोड़ मरोड़ कर पेश कर रही है! 2 G स्पेक्ट्रम घोटाला जिसमे देश का लाखो करोड़ रुपया कुछ भ्रष्ट नेताओ के जेब में चला गया ! खेल के नाम पर घोटाला हुआ! यहाँ तक कि शहीदों के परिवारों के लिए बने आशियाने को भी इस पार्टी के नेता हड़प गये! और देश में महंगाई के लिए जिम्मेवार है भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचार के लिए कॉंग्रेस जिम्मेवार है! राहुल गाँधी भ्रष्टाचार की बात करे और जवाब दे कि क्या कार्यवाही की जा रही है? क्यों सरकार संयुक्त संसदीय समिति से जांच कराने को राजी नही है? आतंकवाद को धार्मिक रंग में रंगने वाली कांग्रेस पार्टी बाज़ आये और आतंकवाद और भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कदम उठाये!
राहुल गाँधी के बारे ने जो खुलासा हुआ है वो वोट की राजनीति करने वाली कॉंग्रेस की रणनीति को सामने लाता है! कि केसे वोट के लिए आतंकवाद को कॉंग्रेस धार्मिक रंग में रंग रही है! कॉंग्रेस सरकार आतंकवाद के मुद्दे पर नरम रही है जिसका उदाहरण अफज़ल गुरु को फांसी न देना है! और जिस मानसिकता का खुलासा हुआ है वो आतंकवाद का बौधिक पोषण करने वाली है ! इस तरह की मानसिकता की हम निंदा करते है और चेतावनी देते है कि राष्ट्र को तोड़ने वाले विचारों को त्याग दे और देश की भलाई में काम करे !

Thursday, December 2, 2010

ये क्या हो रहा है


आज के परिदृश्य में देखे तो कांग्रेस पार्टी बैकफुट पर है !कारण है भ्रष्टाचार ! कोमंवेल्थ खेल हो चाहे उस से पहले आई पी एल घोटाला या फिर हाल का आदर्श आवास घोटाला और २ जी घोटाला सभी को ले कर कांग्रेस घिर गयी है! संसद को शुरू हुए १४ दिन हो गये है लेकिन एक भी दिन कार्यवाही नही हुई जो की एक शर्म की बात भी है! सत्ता पक्ष सारा दोष विपक्ष पर डाल कर इतिश्री कर रहा है! सभी घोटालो को लेकर देश सकते में है! क्यों की लगभग लाखो करोड़ रूपये का गोलमाल है इतना रुपया जो की देश की गरीबी हटाने में अहम् रोल अदा कर सकता था सरकार की नाकामी और भ्रष्टाचार के प्रति नरम रुख के कारण कुछ नेताओं की जेब में चला गया और सरकार आज भी बचाव की मुद्रा में है! विपक्ष इस मामले में संयुक्त संसदीय समिति की जांच की मांग कर रहा है जबकि सरकार इस बात को मान नही रही है यही गतिरोध का कारण बना हुआ है! आज कांग्रेस पार्टी और सरकार भ्रष्ट नेताओ से इस्तीफ़ा दिला कर कह रही है की हमने भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़े कदम उठाए है! लेकिन लाखो करोड़ का घोटाला करने के बाद कोई आदमी मंत्री रहे न रहे उसे फर्क नही पड़ता बल्कि और ज्यादा शक्तिशाली हो जाता है! पहले घोटाला करना और फिर इस्तीफ़ा देना क्या ये हे काफी है! क्या कोई सजा नही है यदि है तो फिर कहा है! कलमाड़ी और राजा का मामला देखे तो दोनों अपने को पाक साफ़ बता रहे है जबकि राजा के खिलाफ तो कई सबूत है लेकिन फिर भी वो एक शहीद की तरह मंत्रिमंडल से गये कहा तो उसे बर्खास्त करना चाहिए था और कहा सरकार लाचार बन कर उसके इस्तीफे का इंतज़ार करती नज़र आई! आखिर क्या मजबूरी थी सरकार की ? राडिया के टेप ने तो और भी कमाल किया है! कई नेता पत्रकार का रिश्ता ज़ाहिर हुआ है! लेकिन क्या कार्यवाही होगी? इस बात का देश इंतज़ार कर रहा है! अपनी शासन प्रणाली में सजा का न दिया जाना आम जनता का प्रणाली से विशवास उठाने को काफी है! आज ये प्रश्न किये जाते है की नाक्सालवाद क्यों है? जो कुछ आज हो रहा है क्या ये कारण काफी नही है एक गरीब का एक आम आदमी का क़ानून से विशवास डिगाने को? जो पैसा उसकी खून पसीने की कमाई का हो जिस पर पहला हक देश की आम जनता का हो, उस पैसे का घोटाला हो के किसी एक व्यक्ति या कुछ लोगो की जेब में जाना कहा तक उचित है! आज भारत एक गरीब देश है! कोई भी रिपोर्ट कुछ भी कहे लेकिन सच्चाई ये है की गरीब भारत में कुछ अमीर राज कर रहे है और गरीब उनको चुन के उन्हें और अमीर बना रहे है और गरीब अमीर की खाई बढती जा रही है! राहुल गाँधी ने दो भारत बनने की बात कही थी लेकिन उनको ये याद रखना चाहिए की इस दो भारत को बनाने में उनकी ही पार्टी का हाथ है! आज कांग्रेस विपक्ष पर आरोप लगाती है लेकिन अगर पाक साफ़ है तो विपक्ष की मांग पूरी करने में कोई आपत्ति नही होनी चाहिए! ऐसा कर के अपनी विश्वसनीयता को बनाए रखने में पार्टी सफल हो सकती है नही तो घोटालो की फेहरिस्त जिस तरह से लम्बी होती जा रही है उसे देख कर लगता है की गरीबी हटाओ की केवल बात करने वाली कांग्रेस अब भ्रष्टाचार बढाओ और भ्रष्टाचारी को बचाओ नीति पर काम कर रही है! सरकार को जांच करनी चाहिए विपक्ष की मांग को मान कर अपने ऊपर लगे आरोप को हटाना चाहिए! आज कांग्रेस के प्रवक्ता ने कहा की विपक्ष नक्सली के एजेंट है ऐसा कह कर वो क्या जाताना चाहते है कोई नही जनता है! अपनी बौखलाहट को दर्शाने का इस से भद्दा तरीका नही हो सकता ! जो सरकार की चुप्पी है ये हे भ्रष्टाचार की कारक है! इसी कारण ये नाक्सालवाद और गरीबी है! एकमात्र उम्मीद अब अदालत से हे है की कुछ कठोर कदम उठाए जा सकते है! इसी का इंतज़ार हो रहा है और देश का पैसा देश को मिलेगा और दोषी को सजा मिलेगी ऐसी उम्मीद है

Wednesday, November 3, 2010

नारे की नही सही नीतियों की जरुरत


आज फिर से गरीबी हटाओ का नारा लगाया जा रहा है! कांग्रेस इस नारे को दोबारा से भुनाने की तेयारी में है! पूर्व प्रधानमन्त्री स्वर्गीय इंदिरा गाँधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया था! और एक लहर चली थी ! कांग्रेस की सरकार तो बनती रही नारा भी चलता रहा मगर गरीबी हटी नही बल्कि बढती गयी! सरकारी आयोग हे चिल्लाते रहे की गरीब बढ रहे है लेकिन सरकारे आंकड़े दिखा रही है शेयर में उछाल दिखाती है और gdp दिखाती है! लेकिन कोई गरीब को रोटी और काम की बात नही करता है! चुनाव है तो कांग्रेस जो की केंद्र में सत्ता में है तरह तरह से अपनेको गरीब हितेषी बता रही है! जबकी सबसे अधिक शासन करने वालीकांग्रेस क्यों भूल जाती है की सिर्फनारे बाज़ी हो रही है कोई काम नहीहो रहा! कभी गरीबी हटाओ के नाम पर कभी आम आदमी के नाम पर सच्चाई तो यह है की नारा केवलशब्द तक ही सीमित रहा ! आज कांग्रेस फिर से गरीबी हटाओ काअलाप कर रही है तो कोई प्रसन्नतावाली बात नही है! कोंग्रेस के युवराजने दो भारत की बात कही है एकगरीब और एक अमीर और कोंग्रेसका हाथ दुसरे गरीब वाले भारत के साथ बता कर अपनी पारिवारिक नारेबाजी की परंपरा का निर्वहन कररहे है! कोंग्रेस की बैठक में सब तरहसे चर्चा हुई और सोनिया गाँधी भी सरकार से खफा खफा नज़र आई , और कहा की शेयर मार्किट से गरीब का भला होने वाला नही! लेकिन यहाँजरुरी ये बात थी की अपने कृषि मंत्री के मुद्दे पर दस दिन और दोहफ्ते का आश्वासन देते है कभी कहते है की वो कोई ज्योत्षी नही है! महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री कहते है की आदर्श कालोनी का कारगिल से लेनादेना नही जबकि वहा के गृह सचिव कहते है की भूमि की इज़ाज़त कारगिल के नाम पर ली है! भ्रष्टाचार से घिरी कांग्रेस का दो भारत और गरीबी हटाओ या आम आदमी जैसे नारों से पहले अपने ऊपर लगे भ्रष्टाचार के आरोप पर स्पष्टीकरण देना चाहिए और सोनिया और राहुल खुद को संघठन का आदमी बताने सेनही चूक रहे है लेकिन अपनी सरकार को कोई निर्देश सकारात्मक दिशा में नही दे रहे है! ऐसा दोगलापन क्यों? भारत आज दो भारत क्यों बना इसकी चर्चा भी जरुरी है! सबसे जरुरी है की सरकार गंभीर हो कर काम करे! नारे की नही सही नीतियों की जरुरत है और उससे भी ज्यादा जरुरत है नीतियों के सटीक कार्यान्वयन की! इसकी जिम्मेवारी प्रमुख रूप से सरकार पर है और अगर गरीबो के हितेषी बनकर छाती पीटने वाले सहयोग करेंगे तो लाभ होगा! GDP

Tuesday, November 2, 2010

कश्मीर को चाहिए काम, रोटी और कलम



सर्दी का मौसम सर पर है लेकिन कश्मीर की आग की गर्मी से सारा भारत तप रहा है! राजनीतिक दलों के बीच भी जुंग ज़ारी है और अन्य लोग भी इसमें कूद चुके है! अरुन्धती रॉय का कहना है की भारत का कश्मीर अभिन्न अंग नही है! बहुत से लोग बहुत कुछ कह रहे है! वहा के मुख्यमंत्री कहते है कश्मीर का विलय भारत में नही हुआ है! इस तरह से अलगाववाद को बढ़ावा देने में होड़ मची है ऐसा साबित कर रहे है! कश्मीर समस्या है क्या इसको समझने की जरुरत भी है ! आज देखा जाए तो कश्मीर समस्या को आजादी के बाद से जोड़ कर देखा जाता है ! जबकि असली समस्या तब से शुरू हुई जब से वहा जबरन मतान्तरण शुरू हुआ! मतान्तरण के बाद वहा पर जिसने इस्लाम स्वीकार नही किया उसको प्रताड़ित किया गया और लाखो लोगो को तो घाटी छोड़ के भागना पड़ा जिनको कश्मीरी पंडित कहा जाता है! कश्मीरी पंडित वो लोग है जिन्होंने अपना धर्म परिवर्तित नही किया! आज कोन सी आज़ादी की मांग की जा रही है? कैसी आजादी चाहिए ? किस से आजादी चाहिए और क्यों आजादी चाहिए? वहा का माहोल तो कुछ और ही कह रहा है ! वहा तो और ही बात हो रही है! वहा जो हो रहा है उसे अलगाववाद कहते है! कश्मीर के लोगो को समस्या हो सकती है! हो सकता है की उनको वो सब नही मिला हो जो मिलना चाहिए! मानाजा सकता है की उनको रोज़गार नही मिला , कोई लाभ नही मिला ये मुद्दा और है! ये मुद्दा सरकार की नाकामयाबी से जुदा है! केंद्र और प्रदेश सरकार इस के लिए सीधे तौर पर जिम्मेवार है और आज जो हो रहा है वो मुद्दे से हट कर हो रहा है! मुद्दा है वहा के लोग क्यों असंतुष्ट है? जो धरा ३७० के कारण वहा के लोगो को अधिकार मिले है उसके बाद भी असंतुष्ट क्यों है?
इतनी घोषनाए इतने वादे इतनी बातें फिर भी हंगामा ! व्यवस्था की असफलता ही इसका कारण है! लेकिन इस मुद्दे को सुलझाने के स्थान पर राजनीति हो रही है! और अलगाववादी लोग इसका फायदा उठा रहे है! वहा के लोग रुष्ट हो सकते है लेकिन जो सियासी पत्थर उनके हाथो में है वो कुछ और हे कहानी कह रहे है! सियासत हो रही है और कुछ लोग देश को बाँटने की कोशिशो में लगे हुए है! दो विचार चल रहे है! एक वहा की हालत से सम्बंधित हो सकता है की सरकार असफल हुई है दूसरी जो बात चल रही है वो ज्यादा खतरनाक है! ये विचार हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और को चरितार्थ करता है! अलगाववाद नाम के इस ज़हर ने आज खतरनाक रंग ले लिया है! आज बात होती है गरीबी और मानवाधिकार की लेकिन इस के पीछे अलगाववाद की फसल बोयी और काटी जा रही है! आजादी मांग रहे है उस देश से जो कुछ न लेते हुए कश्मीर को सब कुछ दे रहा है! अगर कुछ समस्या है तो उसे सुलझाने का रास्ता ये नही है जो हो रहा है! भारत का झंडा जला कर और पकिस्तान की भाषा बोल के गरीबी दूर नही होगी! बल्कि उन लोगो को बेनकाब करना होगा जिन के कारण आज कश्मीर में आग है और सर्द फिजाओं में अलगाववाद चरम पर है! और सत्ता का गलियारा राजनीती में व्यस्त है! वहा के सियासी पत्थर का जवाब देने से नही बन रहा है इसका कारण क्या है? कोन है जिसके कारण आज कश्मीर इतने प्रयास के बाद भी पत्थर बाज़ी में व्यस्त है? क्यों सुबह एक धमाके से शाम एक मातम से होती है? क्यों इस जन्नत में इतनी आग है? क्या है जो भारत का ताज आज जल रहा है? इसका चिंतन करने का समय निकल चुका है लेकिन अभी भी कुछ हो सकता है! इतिहास की भूल को ध्यान में रखते हुए किसी भी बहरी दबाव के बिना अपने विवेक से भारत का फैसला होना चाहिए जो भारत को जोड़ने में सहायक हो! एक बात आई थी की पत्थर फैंकने वाले हाथो को काम मिले! य भी सही है और वहा के मुख्यमंत्री ने कोई घोषणा भी की है लेकिन वो प्रयास विफल क्यों हुए जो पूर्व में किये गये थे इसकी समीक्षा करने का भी यह उचित समय है! अरबो की धनराशी जो वहा व्यय होनी थी वो क्यों नही हुई? हुई तो कहा हुई इस बात पर भी जवाबदेही सुनिश्चित हो! कश्मीर की समस्या जो लग रही है वो बहुत प्राचीन है और ये समस्या तुष्टिकरण की नीति से और ज्यादा बढ गयी है ! आज अलगाववादी नेता डेल्ही में आ कर भाषण दे कर जा रहे है केसी शर्मनाक बात है? एक पत्रकार यहाँ तक की मुख्यमंत्री जो भारत में मंत्री भी रह चुके है कहते है की कश्मीर का भारत में विलय नही हुआ है! भारत का अभिन्न अंग कश्मीर आज तेजधार वाली तलवार र चल रहा है जहा आम जनता को बहलाने के लिए भूख गरीबी और हक- हकूक की बात हो रही है लेकिन असल में अलगाववाद का झंडा बुलंद हो रहा है! ऐसे समय में सरकार की कुशलता पर प्रश्न चिन्ह लगता है ख़ास तौर पर तब जब भारत सरकार के स्वामी महमोहन सिंह जी कहते है की कश्मीर को स्वायत्त राज्य बनाने पर विचार किया जा सकता है! कश्मीर को आज एक सुलझा हुआ राष्ट्रवादी नेतृत्व चाहिए उस से भी पहले "भूल" सुधार होना जरूरी है! तुष्टिकरण किसी का भी हितकारी नही है! सारा देश देख चुका है की ३७० धरा से कश्मीर ने कितनी उन्नति की है! इस लिए वहा भी भारत का संविधान हो पूरी तरह से! किसी मुख्यमंत्री को प्रधान मंत्री कहने से विकास नही होता है वरन मुख्यमंत्री की सोच जनता से जुडी होनी चहिये१ भारत में तिरंगे से बढकर संविधान से हटकर कुछ भी होना हितकारी नही है! आज कश्मीर को जरुरत है एक बेहतर प्रशासनिक और राजनीतिक ढाँचे की! जिन हाथो में सियासी पत्थर है उन हाथो को कलम और काम देने की! और जो मासूम हाथो में पत्थर थमा कर अपनी सियासी चाले चल रहे है उन हाथो को काट फेंकने की!
हम सभी को सोचना चाहिए की धरा ३७० से कश्मीर और अन्धकार में जा रहा है! वहा कितना पैसा कहा लगा कोई सवाल नही कर सकता ! कोई पूछ नही सकता ! कोई सूचना का अधिकार लागू नही है! इस सब से आम जनता का लाभ केसे हो सकता है! आम जनता को आज कलम काम और रोटी की जरुरत है१ किसी धरा या आजादी की नही ! आजादी यदि चाहिए तो अलगाववाद से! अलगाववादियों से! एक बार फिर मेरा आवाहन युवा शक्ति से है की कश्मीर हमारा अपना प्रदेश है! वहा जो हो रहा है उसका सीधा असर हम पर पड़ता है क्यों की भारत का अभिन्न अंग है! समस्या को सोचे समझे और आगे बड़े ! ! कश्मीर में काम कलम और रोटी का प्रबंध सरकार करे और राजनीती बंद हो! नही तो एक भूल जो हुई थी उसे आज दोहराने की तेयारी हो रही है! और अगर ऐसा हुआ तो आने वाला समय में जन्नत नासूर बन जाएगी और हम कोसते रह जायेंगे!
अब समय आ गया है की कश्मीर पर नीति स्पष्ट हो सीढ़ी बात हो सीधा वार हो! समस्या को उलझाने वालो को सीधा जवाब दिया जाए और कश्मीरी और जम्मू प्रदेश की समस्या का समाधान हो ...काम कलम और रोटी एक नारा न बन के रह जाए बल्कि एक मिशन हो और पूराहो!


Tuesday, October 26, 2010

NO POVERTY BUT STARVATION


There is something wrong with growth economics. After all, 18 years after India ushered in economic Liberalization, the promise of high growth to reduce poverty and hunger, has not worked. A report by Suresh Tendulkar, formerly chairman of Prime Minister's Economic Advisory Council, now estimates poverty at 37.2 per cent, an increase of roughly 10 per cent over the earlier estimates of 27.5 per cent in 2004-05. This means, an additional more than 100 million people have slipped below the poverty line in just four years. The number of poor is multiplying at a time when the number of billionaires has also increased. The economic wealth of Mere 30-odd rich families in India is equivalent to one third of the country's growth. The more the wealth Accumulating in the hands of these 30 families, the more will be country's economic growth. If you were to discount the economic growth resulting from the 6th pay commission, which is 1.9 per cent of the GDP, India's actual economic growth will slump to 4 per cent. reality is that the complicated arithmetic hides more than what it reveals. Poverty estimates were earlier based on nutritional criteria, which means based on the monthly income required to purchase 2,100 calories in the urban areas and 2,400 calories in the rural areas. Over the years, this measure came in for sharp criticism, and finally the Planning Commission suggested a new estimation method that is required to survive - includes food, fuel, light, clothing and footwear. Accordingly, the Tendulkar committee has worked out that 41.8 per cent of the population or approximately 450 million people survive on a monthly per capita consumption expenditure of Rs 447. In other words, break it down to a daily expenditure; it comes to bare Rs 14.50 paise. I wonder how cans the rural population earning more than Rs 14 and less than say even Rs 25 a day is expected to be over the poverty line. India's poverty line is actually a line of starvation I can say. The poverty line that is laid out actually becomes the upper limit the government must pledge to feed. People living below this line constitute the Below the Poverty Line (BPL) category, for which the government has to provide a legal guarantee to provide food. It therefore spells out the government subsidy that is required to distribute food among the poor. More the poverty line more is the food subsidy. If the government accepts Tendulkar committee report, the food subsidy bill will swell to Rs 47,917.62-crore, a sharp rise over the earlier subsidy of Rs 28,890.56-crore required to feed the BPL population with 25 kg of grains. This is primarily the reason why the government wants to keep the number of poor low. In other words, the poverty line reflects the number of people living in hunger. So poverty is not only empty pocket but here it means acute hunger. India's poverty estimates therefore are the most stringent in the world. I don't know the economic justification of hiding the true figures, but politically it makes terrible sense. Each government therefore is happy to gloss over the starvation figures in the guise of poverty estimates. I wonder when India will include a basket of essential good like footwear, cycles, sewing machines, solar lamps, water purifiers etc for the poor. This is simple economics, and not political compulsion as the media will like us to believe. Going back to the poverty line arithmetic, the 2007 Arjun Sengupta committee report (officially the report of the National Commission on Enterprise in Unorganized Sector), which had estimated that 77 per cent of the population or 836 million people, were unable to spend more than Rs 20 a day, is probably a correct reflection of the extent of prevailing poverty. In addition to monthly income, poverty estimates must incorporate the human development index as prepared by the United Nations Development Programme. India should therefore have two ways to classify the poor. The line of starvation, needing direct cash transfers in addition to the basic requirement of food supplies. And a Poverty line, needing not only food (but in lesser quantities) but also other economic necessities like sewing machines, water-purifiers, pressure cookers, etc. Saurabh Chauhan

Friday, October 8, 2010

दिशा बदलनी है..


राजनीति को दलदल कहा जाता है , की इसमें एक बार फंस गया वो निकल नही सकता वरन धंसता ही चला जाता है! ऐसा कहना मेरा नही बल्कि ये एक आम राय है, जो समाज रखता है! और राजनीति का नाम सुन कर अपना नाक मूह सिकोड़ देते है! लेकिन ऐसा है क्या इसमें कोई बता नही सकता! कोई कहता है कि अपराधीकरण कोई कहे व्यापारीकरण और भी कई विचार आते है! लेकिन ये सब बातें तो अपने समाज में भी विद्यमान है!

{जहा हम रहते है उसे हम समाज कहते है!
अपराध भी है यहाँ व्यापार भी है यहाँ
बुराइया भी भरी है दलदल जान पड़ता है
सामान भी है यहाँ , बाज़ार भी है यहाँ!}

तो राजनीति के बारे में ऐसा सोचना क्यों? मेरा मानना है कि राजनीति ही किसी देश की दिशा एवं दशा बदल सकती है लेकिन उसमे समाज की भागीदारी होना भी जरूरी है! युवाओं को शामिल होना भी जरूरी है, कुर्बानी किसे कहते है, अपने आप को तिल तिल जलाना किसे कहते है समाज का पुनर्निर्माण किसे कहते है , उस के क्या क्या लाभ हो सकते है ये सब बातो का ज्ञान होना हमारे लिए जरूरी है! आज में तो इसे विदेशी ताकतों का षड़यंत्र ही कहूँगा और अपनी जो राजनीतिक व्यवस्था है है उसकी भी कमजोरी नज़र पड़ती है! षड़यंत्र यह है की अपने देश को आर्थिक रूप से पंगु कर देना और यहाँ का जो सामाजिक और संस्कृतक ढांचा है उसे छिन्न भिन्न कर देना ताकि समाज में कोई भी ऐसी भावना न रहे जिस से उसका अपने राष्ट्र से कोई सरोकार हो! आज इस षड्यंत्र का " सेम्पल " भी कई बार सामने आता है जब समाज जड़ हो जाता है भावना शून्य हो जाता है
अब राजनीति को देखा जाए तो यहाँ भी कई तरह के तत्व विद्यमान है! बाज़ार भी है व्यापार भी है लेकिन इस बात के लिए हम राजनीति गन्दा खेल है ऐसा नही कह सकते बल्कि हमे सामूहिक जिम्मेदारी लेनी होगी और स्वीकारना होगा इस सच को की राजनीति में जो भी नेतिक पतन हुआ है उस के लिए हम सब जिम्मेवार है! एक नेता को टीवी पर रिश्वत लेते दिखाया जाता है तो हम कई दिन उसकी चर्चा करते है लेकिन वो रिश्वत देने वाला कोन था ? वो तो राजनेता नही था कोई सांसद नही था ! उस बात पर समाज मौन रहता है! जिम्मेवारी लेने से हम डरते है तो हमे किसी की बुराई करने का कोई अधिकार नही है! आज कभी राजनीति की बात आये तो कथित आधुनिक वर्ग अपनी कन्नी काट लेता है और जब कोई काम हो तो रिश्वत जेब में ले के अपनी नाक इसी राजनीति के चरणों में रख देता है! अगर एक पल मान लिया जाए की राजनीति गन्दी है तो भी में ये कहूँगा की उसका अपना एक आस्तित्व है गन्दी है तो है लेकिन इन कथित सामाजिक ठेकेदारों का दोगलापन जो सामने आत है इसे क्या कहेंगे ? लेकिन राजनीति एक गन्दा खेल नही बल्कि समाज का हे दबाव रहता है और कई बार मेहरबानी रहती है कि इसे गन्दा कहा जाता है! हमे यह नही भूलना चाहिए कि देश कि बागडोर हमारे हाथ में है और नौजवान इस देश के पहिये है! सब दुरुस्त रहेगा तो देश रुपी वाहन आगे बढ पायेगा १ लेकिन आज केवल राजनीति और नेताओ की निंदा करना हे परम कर्त्तव्य समझा जाता है! कोई बात हुई तो राजनीति की सहमत आ जाती है! क्या यह सही है क्या यह समाधान है? नही!!
ये समाधान नही हो सकता वरन समस्या को बढाने वाला जरूर हो सकता है आज समाज जागृत नही है यदि है तो सिर्फ अपने अधिकारों के लिए! देश का क्या कोई जनता नही और न ही कोई जानना चाहता है! सब डॉक्टर इंजीनीर बन कर खूब मालामाल होना चाहते है दुनिया कि चकाचौन्द से मुकाबला करना चाहते है लेकिन मेरा एक सवाल है जीवन यापन ठीक है रहन सहन में चकाचौंध भी ठीक है लेकिन इस सब में समाज का जड़ हो जाना और अपनी व्यवस्था का गला घोंट देना सही नही है! अपना देश मेरा पहला कैरियर है! इसकी चिंता जरूरी है आराम भी मिलेगा सुकून भी होगा केवल तभी जब अपना देश मज़बूत होगा! इसकी मजबूती के भी कही द्वार है! केवल तकनीक ही सब कुछ नही है बल्कि संस्कृति और विचार भी जरूरी है इस देश की पहचान आज भी संस्कृति और विचारों से है! इसका संरक्षण करना और भारत का जो विचार है जिसके कारण भारत अपने आप में एक विचारधरा है जिसे हम भारतीयता कहते है! जब यह मज़बूत होगा तब हर घर में रोटी होगी रौशनी होगी और ये रौशनी सार्व विशव को रौशन करेगी ऐसे मेरा मानना है! लेकिन आज के हालात देश को सही दिशा में ले जा रहे है ऐसा नही लगता है! आज समाज का नेतिक पतन इस देश को डुबो रहा है ! राजनीती को जो हमने पंगु बनाया है उसी कारण आज यहाँ निराशावाद का बोलबाला हो रहा है! अपना देश आंतरिक दुश्मनों से और बाहय दुश्मनों से जूझ रहा है! हम कहते है कि तलवारों की धारो से इतिहास हमारा चलता है और आज ये कहने कि नौबत है कि तलवार की धार पर हम चल रहे है! इसके जिम्मेवार हम है! राजनीति कोई गन्दा खेल नही बल्कि राजनीति समाज के विकास का उत्थान का एक माध्यम है बशर्ते इसमें समाज की सकारात्मक भागीदारी हो! वोट की राजनीति नही विकास की राजनीति हो! ऐसा एक कदम इस देश कि दिशा बदल सकता है दिशा बदली तो दशा बदल सकती है और जब दशा बदल जाएगी तो भारत देश पुन: विश्व गुरु के सिंहासन पर बेठेगा ऐसा मेरा मानना भी है स्वप्न भी और में ये चाहता हु कि ये हर भारतीय का स्वप्न हो!

Wednesday, October 6, 2010

राष्ट्रवाद और आतंकवाद में फर्क करना समझें राहुल



राहुल गाँधी ने संघ के बारे में जो बयान दिया है और जो बतुकी तुलना की है वो शर्मनाक है! इस से भी गंभीर बात ये है की देश के युवाओं को रिझाने की कोशिश करने वाले राहुल गाँधी असलियत से वाकिफ नही है! मातृभूमि पर जब जब भी संकट आये तब तब संघ के स्वयंसेवक आगे आये! देश के आज़ाद होते ही जो लड़ाई हुई थी कश्मीर में जो हवाई पट्टी थी वहा बर्फ जमी थी! उसको हटाने कोन आया था! राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आया था! ६२ को जब चीन से लड़ाई हुई तो सेना की मदद के लिए संघ आगे आया! संघ देश को जोड़ने वाली विचारधरा है! संस्कृति और राष्ट्रवाद की संरक्षक है! और राहुल गाँधी बेतुकी बात कर रहे है! राहुल गाँधी एक पार्टी के नेता है! और ऑटोमेटिक नेता है! तो विषय की समझ न होना लाज़मी है! राहुल गांधी इस तरह से राष्ट्रवाद का मज़ाक न उडाये! राष्ट्रवाद और आतंकवाद में फर्क करना सीखे यही उनके लिए हितकारी होगा! ये संघ है जो राष्ट्रवाद की बात करता है! अब ज़रा राहुल ये बताये की चरार-इ-शरीफ में बिरयानी खाने और खिलाने वाले कोन थे? वहा क्या गुल खिलाये जा रहे थे? राहुल क्या कहेंगे?
कोन क्या कहेगा? है कोई जवाब? आतंकियों के साथ बिरयानी खाने वाली पार्टी के नेता आज बेतुकी बात कर रहे है!
संघ देश को जोड़ता आया है आगे भी जोड़ेगा! संघ राष्ट्रवाद की बात करता है, भारत की बात करता है परम वैभव की बात करता है! कभी आतंकियों के साथ बिरयानी नही खाता!
भगवा हे लहराया था भगवा ही लहराएगा
जब संघ दंड लहराएगा तो होश ठिकाने आएगा